🚩 राजस्थान का स्वतंत्रता संग्राम
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में वीरों और शूरवीरों की भूमि राजस्थान का योगदान अत्यंत गौरवशाली रहा है। स्वतंत्रता से पूर्व राजस्थान अनेक देशी रियासतों (राजपूताना) में बंटा हुआ था। यहाँ न केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ, बल्कि रियासती सामंतों के अत्याचारों, भारी-भरकम करों (लगान) और बेगार प्रथा के विरुद्ध भी आवाज़ उठाई गई।
⚔️ प्रमुख स्वतंत्रता एवं जन आंदोलन
1. बिजोलिया किसान आंदोलन (1897–1941)
यह राजस्थान के इतिहास का सबसे लंबा (लगभग 44 वर्ष) और पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन था।
- मुख्य नेता: साधु सीताराम दास (प्रारंभिक), विजय सिंह पथिक (मुख्य मार्गदर्शक), माणिक्यलाल वर्मा।
- कारण: किसानों पर थोपे गए 84 प्रकार के लाग‑बाग (कर), अत्यधिक लगान और बेगार प्रथा।
- ऐतिहासिक महत्व: राजस्थान का पहला सुसंगठित एवं सफल किसान आंदोलन।
2. बेगूँ किसान आंदोलन (चित्तौड़गढ़)
- क्षेत्र: चित्तौड़गढ़ (मेवाड़ रियासत)
- नेतृत्व: रामनारायण चौधरी (विजय सिंह पथिक के निर्देशन में)।
- कारण: सामंती शोषण और अन्यायपूर्ण करों का विरोध।
3. भगत (भील) आंदोलन एवं मानगढ़ धाम
गोविंद गुरु ने दक्षिणी राजस्थान के भील समाज में सामाजिक सुधार, शिक्षा और अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 'सम्प सभा' की स्थापना की।
- मानगढ़ धाम हत्याकांड (17 नवम्बर 1913): मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर शांतिपूर्ण सभा कर रहे हजारों भीलों पर ब्रिटिश सेना ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें लगभग 1500 भील शहीद हो गए।
- विशेष पहचान: इसे "राजस्थान का जलियांवाला बाग" कहा जाता है।
4. प्रजामंडल आंदोलन (रियासती जन आंदोलन)
राजस्थान की देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए प्रजामंडलों का गठन किया गया।
- मुख्य उद्देश्य: रियासतों में राजाओं के अधीन उत्तरदायी सरकार की स्थापना, नागरिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति, रियासती अत्याचारों का अंत।
5. भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में योगदान
1942 में महात्मा गांधी के "करो या मरो" के आह्वान पर जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर और कोटा जैसी रियासतों में स्वतंत्रता सेनानियों और युवाओं ने सड़कों पर उतरकर तीव्र प्रदर्शन किए।
👤 प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी व उनका योगदान
| स्वतंत्रता सेनानी | मुख्य योगदान / पहचान |
|---|---|
| विजय सिंह पथिक | बिजोलिया आंदोलन के सूत्रधार, 'राजस्थान सेवा संघ' के संस्थापक (मूल नाम: भूप सिंह)। |
| केसरी सिंह बारहठ | क्रांतिकारी कवि, मेवाड़ महाराणा को चेतावनी देने हेतु 'चेतावनी रा चूंगट्या' की रचना की। |
| गोविंद गुरु | 'सम्प सभा' के संस्थापक, भील जनजाति में सामाजिक पुनर्जागरण के जनक। |
| अर्जुनलाल सेठी | जयपुर में जैन वर्धमान विद्यालय के संस्थापक, क्रांतिकारियों के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में प्रसिद्ध। |
| माणिक्यलाल वर्मा | 'पंछीड़ा' गीत के माध्यम से किसानों में अलख जगाई, मेवाड़ प्रजामंडल के संस्थापक। |
| जमनालाल बजाज | गांधी जी के "पाँचवें पुत्र" के रूप में प्रसिद्ध, जयपुर प्रजामंडल का पुनर्गठन किया। |
| गोकुलभाई भट्ट | "राजस्थान के गांधी" के नाम से विख्यात, सिरोही प्रजामंडल के संस्थापक। |
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📋 प्रजामंडल आंदोलन – एक नज़र में
| प्रजामंडल | स्थापना वर्ष | संस्थापक / मुख्य व्यक्ति |
|---|---|---|
| जयपुर प्रजामंडल | 1931 (पुनर्गठन 1936) | कर्पूरचंद पाटनी; जमनालाल बजाज, हीरालाल शास्त्री |
| मारवाड़ प्रजामंडल | 1934 | जयनारायण व्यास, आनंदराज सुराणा, अभयमल जैन |
| बीकानेर प्रजामंडल | 1936 (कोलकाता) | मघाराम वैद्य, स्वामी लक्ष्मण दास |
| मेवाड़ प्रजामंडल | 1938 | माणिक्यलाल वर्मा (संस्थापक), बलवंत सिंह मेहता (प्रथम अध्यक्ष) |
| भरतपुर प्रजामंडल | 1938 (रेवाड़ी) | गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येंद्र |
| कोटा प्रजामंडल | 1939 | अभिन्न हरि, नयनूराम |
| सिरोही प्रजामंडल | 1939 | गोकुलभाई भट्ट |
| शाहपुरा प्रजामंडल | 1938 | गोकुल लाल असावा |
| डूंगरपुर प्रजामंडल | 1944 | भोगीलाल पांड्या ("वागड़ के गांधी") |
| जैसलमेर प्रजामंडल | 1945 (जोधपुर) | मीठालाल व्यास |
| झालावाड़ प्रजामंडल | 1946 | मांगीलाल भव्य |
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📌 निष्कर्ष
राजस्थान का स्वतंत्रता संग्राम केवल विदेशी हुकूमत से मुक्ति का आंदोलन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक असमानता, सामंती शोषण और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ जनता का एकजुट विद्रोह था। बिजोलिया का धैर्य, मानगढ़ का बलिदान और प्रजामंडलों का लोकतांत्रिक संकल्प आज भी हर राजस्थानी को गौरवान्वित करता है।
यदि आप RPSC या राजस्थान की किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो इन तथ्यों का नियमित दोहराव करें।